Sunday, 13 October 2019

मुझे कुर्सी दे दो नाथ।

हे कृपा निधान , हे भगवान, मैं अपने आपको तुम्हें समर्पित कर रहा हूं। कृपया मुझे कुर्सी दे दो नाथ। फिर जीवन भर जोडूंगा तेरा हाथ। हे नाथ तुने सबकी इच्छाओं को पूरा किया है। तेरी कृपा से लंगड़ा पर्वत चढ़ जाता है ,अंधा देखने लगता है, बहरा सुनने लगता है, गूंगा बोलने लगता है। तेरी कृपा मात्र से आदमी को क्या कुछ नहीं कर जाता है। हे नटवर तुमने अपने भक्तों को यह बचन दिया था कि  तेरी शरण में जो आ जाता है, उसके तुम सारे दुख हर लेते हो । उसे तुम मनोवांछित फल प्रदान कर देते हो। तुमने भक्तों से अहंकार छोड़ने को कहा है, मैंने अहंकार छोड़ दिया है। मैं अब तुम्हारी शरण में हूं। मैं अपने बल पर यह चुनाव नहीं जीत सकता नटवर। तुम भक्तों के कल्याण के लिए धरती पर जन्म तक ग्रहण कर लेते हो। क्या तुम मेरी चुनावी नैया पार करने के लिए एक चमत्कार तक नहीं कर सकते। तुमने दूसरे के भलाई के बारे में सोंचने को कहा था, इसलिए मै दूसरे के बारे में सोच रहा हूं। मेरे विरूद्ध चुनाव लड़ रहा शख्स माया केे वशीभूत है नाथ। उसे हित अनहित का ध्यान नहीं है। मैं नहीं चाहता कि वह चुनाव लड़कर माया के अधीन हो। इसलिए उसे माया से दूर करना चाहता हूं। पर वह मेरी सुनता हीं नहीं। चुनाव में मुझसे जो उसकी बढ़त दिखाई दे रही है वह क्षणिक सुख है। जिसे वह स्थायी समझने की भुल कर रहा है। मैं नहीं चाहता कि मेरा विरोधी माया ग्रस्त हो। माया बड़ी बलवती है। जब वह भगवान को नहीं छोड़ती तो भला उसे कैसे छोड़ेगी। उसे तुम माया से मुक्त कर दो नाथ। वह मेरी बात नहीं सुन रहा है नटवर। मै उसे षाम- दाम -दंड- भेद दिखाकर थक गया हूं। वह नहीं माना। अब तुमपर हीं आस टिकी है ,तेरी कृपा पर हीं मेरी सास टिकी है।  हे कृष्ण कन्हैया तुम मुझे मेरे विरोधियों से मुक्ति प्रदान कर दो। उसे तुम त्याग का उपदेश पिला दो। उसे तुम बता दो कि यह जीवन नष्वर है।  इसके लिए मोहग्रस्त होना कहां की बुद्धिमानी है? इसके लिए वह क्यों माया- मोह कर रहा है । वह क्यों दूसरे के हक को छीनने की कोशिश कर रह है। क्यों सांसारिकता में उलझ रहा है। अन्त समय कोई उसके साथ नहीं जाएगा। उन्हें यह बता दो कि सिकंदर विश्व विजयी होकर भी इस संसार से खाली हाथ हीं गया था। उसे तुम यह बता दो कि हर जीव में वह खुद को देखेगा तो उसका द्वैत मिट जाएगा, दूसरे की उपलब्धि अपनी नजर आएगी। फिर उसे चुनाव लड़ने कि आवष्यकता हीं नहीं महसूस होगी। मैं चुनाव हार कर कहां मुंह दिखाउंगा कृष्ण कन्हैया। इसलिए सन्यास ले लूंगा। लेकिन मेरा सन्यास मजबूरी में लिया गया होगा। क्या यह कायरता नहीं होगी ? क्या यह अध्यात्म के मूल सिद्धान्त के विरूद्ध नहीं होगा? अध्यात्म की पुस्तकों में कहा गया है कि सन्यास का भाव हृदय से उठना चाहिए। और सन्यास गृहस्थ आश्रम में रहकर भी फलीभूत हो सकता है। समस्याओं से भागकर जंगल चले जाना भगेड़ूपन है। मेरी लाज अब तेरे हाथ में है गिरिधर। और तेरी लाज मेरे हाथों मे, क्योंकि अगर यह चुनाव मैं हार गया, तो तुम्हारे इस कथन पर कोई विश्वास नहीं करेगा, कि जो अपने आपको तुम्हें समर्पित कर देता है, उसके आप सारे कष्ट दूर कर देते हो।

Wednesday, 9 October 2019

रामभरोसे दूर होगी महंगाई।

मेरे देश के लोग भी महान हैं। कारण कि यहां जब भी महंगाई बढ़ती है लोग ऐसा हो- हल्ला करते हैं मानो आसमान टूट पड़ा हो। मानो पहली बार इस देश में महंगाई  बढ़ी हो। महंगाई से लोग जब इतना आतंकित हो जाते हैं तो खुदा न खास्ता  कभी विदेशी आक्रमण हो गया तो लोग क्या करेंगे । वैसे पाकिस्तान एवं चीन जैसे पड़ोसियों के रहते विदेशी आक्रमण होने की संभावना कम हीं है। मैं लोगों से अक्सर कहता हूं भाई जमाने के साथ बदलो । क्या आज भी चवन्नी -अठन्नी में बोरा भर समान खरीद लाने की बात सोंचना यथार्थ में जीना कहा जाएगा ?
वैसे तो दर्शनशास्त्र में आस्तिकों एवं नास्तिकों का वर्गीकरण विभिन्न आधारों पर किया गया है। लेकिन मेरी नजर में आज के समय में आस्तिकों एवं नास्तिकों के वर्गीकरण का एकमात्र आधार मूल्यवृद्धि होनी चाहिए। जो महंगाई में आस्था रखता है वह आस्तिक है और जो आस्था नहीं रखता हो वह नास्तिक है। वैसे देखा जाए तो यह वर्गीकरण पहले वाले वर्गीकरणों का विरोधी नहीं है। आवश्यकता है मेरे जैसे समझदार होने की। जिन्हें ईश्वर के वचनों में आस्था है वे मंहगाई का रोना नहीं रोते। वे अपने आपको महंगाई के सामने समर्पण कर देते हैं। और कहते हैं कि शायद भगवान कि यहीं इच्छा है।
अब इसके समाधान पर विचार करते है। मेरा तो शुरू से मानना है कि हिन्दूस्तान की अधिकांश समस्याओं का समाधान राम भरोसे हीं हो सकता है। हो-हल्ला करने से कुछ लाभ होने वाला नहीं है। रामदेवजी एवं अन्ना हजारे को भीे मेरी मुफ्त सलाह है कि देशवासियों को चैन से रहने दें। देश में भ्रष्टाचार का हव्वा मत खड़ा करें। मेरा दोनो महानुभावों को सुझाव है कि अगर भ्रष्टाचार देखकर अगर उनको बैचनी होती हो वे ध्यान की अवस्था में चले जाएं। ध्यान की अवस्था में मन को शान्ति मिलती है। ध्यान से प्रत्येक समस्या का समाधान संभव है। दूसरी बात आप दोनों से अनुरोध है कि आप भ्रष्टाचारियों को मांफ कर दें। तब भ्रष्टाचारी का हृदय आपके प्रति सम्मान से भरेगा। आपलोग बड़े हैं तो बड़प्पन दिखाएं। अनशन पर न अड़ें। देश अपना है। नेता अपने हैं। जिसे आपलोग घोटाला समझ रहे हैं। वह दरअसल घोटाला है हीं नहीं वह तो सुविधासुल्क है। आपकी सोच में और भ्रष्टाचारियों के सोंच में अंतर का प्रमुख कारण अलग-अलग स्कूलों में पढ़ना है। शिक्षा में एकरूपता लाइए एवं द्वैत को दूर भगाइए।  आप दोनों विगत मे कभी  जन्तर- मन्तर पर तो कभी कहीं और अनशन करते रहे हैं । आपके देखा- देखी देश में और लोग भी अनशन करते हैं। जरा सोचिये अगर इतने लोग अनशन करेंगे तो विदेशों में यहीं न संदेश जाएगा है कि देश में खाने को नहीं है। तो क्यों आप दोनों देश का नाक कटवाना चाहते हैं। इसलिए मेरी आपको सलाह है कि मूदहूं आंख कतहूं कुछ नाहीं। जरा सोचिए हमारी सरकार इनसान की इच्छा न सही भगवान की इच्छा का तो सम्मान कर रही है न।  कारण की अपून की सरकार को भगवान भरोसेे हो गई है। वह मानती है कि हिंदूस्तान की समस्याओं का समाधान रामभरोसे हीं हो सकता है। यहां की समस्याओं का समाधान किसी अन्ना एवं रामदेव से नहीं वाला है। समस्याओं के समाधान के लिए किसी अचेतन शक्ति की दरकार है।
मंहगाई के मामले में सरकार सबसे ज्यादा भगवान भरोसे है। केन्द्र की सभी सरकारों ने भगवान के प्रति यहीं श्रद्वा कायम रखी है। चाहे वह किसी दल की सरकार क्यों न हो। जबतक सरकार जोर लगाती रहेगी तबतक मंहगाई नहीं जाने वाली। क्योंकि तबतक भगवान समझ रहे हैं कि सरकार अहंकार से भरी हुई है। ज्योंही द्रोपदी की तरह सरकार अहंकार छोड़ देगी भगवान दौड़े चले आएंगे। और महंगाई छूमंतर हो जाएगी।

Monday, 7 October 2019

जूतों की मार मुझे है स्वीकार

बड़बोलनगुरू आज काफी खुश थे। यद्यपि अस्पताल के बेड़ पर पड़े थे, लेकिन फुलकर कुप्पा हुए जा रहे थे। मैं भी उनके खुशी में शामिल होने के लिए अस्पताल जा पहुंचा। देखा गुरू मुंह धुधुन फोड़कर बेड़ पर उछल-कुद कर रहे हैं। मैंने गुरू को जीवन में पहले इतना खुश कभी नहीं देखा था। एक पल तो मैं दुविधाग्रस्त हुआ कि इनको बधाई दूं कि अस्पताल पहुंचने के लिए या खेद व्यक्त करूं। लेकिन भाभीजी ने जिस गर्मजोशी के साथ मेरा स्वागत किया था। उससे मेरी दुविधा समाप्त हुई। और मैंने उन्हें अस्पताल पहुंचने के लिए बधाई दी। फिर मैंने कहा कि यार जन्म दिन बहुत-बहुत मुबारक हो। भगवान करें कि यह दिन आपके जीवन में बार-बार आए। फिर मैं शिकायत भरे लहजे में कहा यार शुभ दिन को भी मार-धाड़ क्या तुम्हे अच्छा लगता है। तुम तो खुदको को भारी विद्वान कहते हो फिर भाभीजी की गाली देने पर तुम्हें गुस्सा क्यों आता है। नम्रता तो विद्वानों का स्वाभाविक गुण है। यह सब क्या तुम्हे अच्छा लगता है। महासंग्राम तो बाद में भी किया जा सकता है।  वे बोले यार मुझे तेरी बुद्धि पर तरस आती है। साठ साल की उम्र में भी तुम एक दम घोंपू के घोंपू रह गए हो। अबकी बार तेरे घर चलूंगा न तो तेरी बीबी से तुझे पिटवाऊंगा। फिर तेरी सारी फिलाॅसफी भुल जाएगी।
वे फिर बोले कि इनके द्वारा मेरी की जा रही आवाभगत को देखकर भी तुम्हें यह लग रहा है आज भी इन्होंने हीं मेरी यह दशा की है। माना कि हम दोनों के बीच महाभारत होता है। लेकिन उसके बाद इनका मैके गमन भी तो हो जाता है। मैने अपनी नासमझी पर अफसोस व्यक्त करते हुए कहा हां यार आज तुम्हारे और भाभी जी के प्यार को देखकर मुझे अपनी किस्मत पर रोना आता है।  लगता है कि कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा हूं। फिर मैने कहा फिर बता यार तुम्हारी यह दशा किसने की है। फिर उन्हों एक मीठी मुस्कान फेंकते हुए कहा अरे पोंगू तुम न्यूज-व्यूज पढते हो। क्या आज सुबह तुमने मेरी अखबार में फोटो नहीं देखी। फिर मैने अपने काॅमन सेन्स का प्रयोग किया और कहा कि लगता है यार तुम्हारी लाॅटरी लग गयी है और तुम मारे खुशी के मुंह-धुधन फोड़ लिए हो। फिर उन्होंने कहा कि अरे बुरबक अगर तुम्हारे पास इतनी सेंस होती तो तुम अबतक झक मारते। वो तो मेरे जैसा दीनदयाल ठहरा जो तुम्हारी कविता को झेल लेता है नही तो तुम्ही लिखते और तुम्हीं पढ़ते। मुझे भी ताव आ गया और कहा कि देखो तुम कविता सुनकर मुझपर कोई एहसान नहीं करते हो, एक सुनने के बाद अपनी ग्यारह सुनाते हो। फिर उन्होंने कहा कि रंग में भंग मत डालो और मुझे बधाई दो। मैने कहा अरे काहें को बधाई कभी तुमने मुझे बधाई दी है। उन्होंने कहा कि मैने तुम्हें इसलिए बधाई नहीं दी है क्योंकी तुम आजतक बधाई का कोई काम हीं नहीं किए हो। मैने कहा कि तुम कौन सा तीर मार लिए हो। भाभीजी ने बहस में हस्तक्षेप करते हुए कहा कि तुम दोनो लड़ते हीं रहोगे या जस्न भी मनाओगे। मैने भरे मन से बधाई दी कि  यार तुम किस्मत वाले हो तुम्हारी लाॅटरी लग गई है। उन्होंने कहा कि हां यार मैं सचमुच किस्मत वाला हूं लेकिन लाॅटरी लगने से नहीं बल्कि जूता खाने से। आखिरकार मेरी सालों की साधना पूरी जो हो गई है। मेरा मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया जिसमें भाभी जी ने दो- चार लड्डू घुसेड़ दिया।
फिर गुरू नेे सारी कथा इस प्रकार सुनायी। उन्होंने कहना शुरू किया कि देखो कवियों को गाली और ताली का कभी अकाल नहीं होता पर जूता पड़ने का सत्कार भी हर दम नहीं मिलता। हुआ यूं कि मैं एक कवि सम्मेलन में  कविता पाठ करने गया था। उक्त कवि सम्मेलन का उद्घाटन एक नेता जी को करना था। नेताजी समय पर नहीं पहुंचे, जैसा की नेताओं के साथ अक्सर होता है। भीड़ कविता सूनने के लिए बेकाबू होती जा रही थी। लेकिन उद्घाटन के अभाव में कविता पाठ हो तो कैसे । आयोजक ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए मुझे यानी झकझोर कवि को मंच पर भेंजा। मैने वहां ऐसा समा बांधा कि सभा स्थल के सारे समियाने उड़ गए। भीड़ वनस् मोर वनस् मोर कहकर गरियाने लगी। मैने भी अपनी सारी नयी पुरानी रचनाओं को सूना डाला।
मेरी कविता का लोगों पर ऐसा असर हुआ कि जिन्हें नीद नहीं आने की बीमारी थी उन्हें नीद आने लगी। भीड़ को मेरी कविता इतनी पसंद आई कि उन्होंने कविता के साथ उसका अर्थ बताने का भी अनुरोध किया। भीड़ ने बाद में मुझसे मुक्कालात भी किया।
तभी नेताजी का लावा लष्कर के साथ आगमन हुआ। और आयोजक से लेकर मंच पर मौजूद अतिथिगण तक नेताजी को माला पहनाने के लिए घुड़दौड़ करने लगे। उसके बाद नेताजी ने माइक संभाला और बोलना शुरू किया। अब नेताजी का स्वागत करने की बारी जनता की थी, जनता जूता बरसा कर उनका स्वागत करने लगी। नेताजी को जनता का सत्कार इतना पसंद आया कि वह वहां से समय से पहले ही प्रस्थान कर गए। और बाकि सारे जूते मुझे खाने को कह गए। मैने भी अपने प्यारे नेता के आदेश का पालन किया और एक-एक करके जूते खाए।
भाई साहब का इतना सत्कार सुनकर मेरे मुंह से लार टपकने लगा।  मैंने कहा कि यार तुम सचमुच भाग्यशाली हो। ऐसे मौके जीवन में बार-बार थोड़े मिलते हैं। लेकिन इस खुशी के मौके पर तुम अपने सबसे प्रिय मित्र को भूल गए। कितना अच्छा होता कि हम दोनों भाई साथ मिलकर जूते खाते। खैर कोई बात नहीं अबकी कवि सम्मेलन हो तो मुझे भी कविता पाठ करने को ले चलना। लेकिन तुम्हारी कविताओं में वो जान नहीं जो लोगों को मंत्रमुग्ध करदे, उन्होंने कहा। नहीं है तो आ जाएगी न, मै भी तुम्हारी तरह दूसरों की कविताओं को सुनाया करूंगा।

मुझे कुर्सी दे दो नाथ।

हे कृपा निधान , हे भगवान, मैं अपने आपको तुम्हें समर्पित कर रहा हूं। कृपया मुझे कुर्सी दे दो नाथ। फिर जीवन भर जोडूंगा तेरा हाथ। हे नाथ तुने स...